तीसरा रास्ता: नया भारतीय

खंड 1: निदान (The Diagnosis)

अध्याय 1: पहचान का धोखा (Pehchan ka Dhoka)

“हम वो नहीं हैं जो हम थे। हम वो हैं जो हम आज हैं। और सच यह है कि आज हम पिछड़ रहे हैं।”


1.1 भूतकाल का नशा (The Opium of the Past)

मेरे प्यारे भाई,

मैं तुमसे हज़ारों मील दूर बैठा हूँ। मेरे पास दौलत है, सुकून है, और वो आज़ादी है जिसके तुम सपने देखते हो। मैंने यह सब किसी का हक़ मारकर नहीं, बल्कि अपनी काबिलियत और तर्क (Logic) से कमाया है। और क्योंकि मैं एक भारतीय हूँ, एक तमिल हूँ, मुझे तकलीफ होती है जब मैं तुम्हें—मेरे अपने देश के युवा को—एक नशे में धुत देखता हूँ।

वो नशा शराब या गांजे का नहीं है। वो नशा है “भूतकाल” (Past Glory) का।

तुम्हारे नेता, तुम्हारे व्हाट्सएप ग्रुप, और तुम्हारे न्यूज़ चैनल तुम्हें दिन-रात एक ही कहानी सुना रहे हैं: “हम विश्वगुरु थे। हमारे पास पुष्पक विमान था। हमने दुनिया को जीरो दिया।”

यह सब सच है। हमारे पूर्वज महान थे। गुप्त वंश (Gupta Empire) शानदार था। चोल राजाओं ने समंदर पार किया था। लेकिन भाई, एक कड़वा सवाल पूछूँ? तुम्हारे पास क्या है?

आर्यभट्ट ने जीरो दिया, यह उनकी कमाई थी। तुम्हारी कमाई क्या है? तुम्हारे शहर की नालियां जाम हैं। तुम्हारे अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं। तुम्हारे पास ढंग की नौकरी नहीं है। और जब तुम इस हकीकत से डरते हो, तो तुम इतिहास की किताब खोलकर उसमें छुप जाते हो।

यह गर्व नहीं है। यह “अफीम” है। यह वो पेनकिलर है जो तुम्हें अपना आज का दर्द भुलाने के लिए दी जा रही है। जब तक तुम यह गाते रहोगे कि “हम महान थे”, तब तक तुम्हें यह दिखाई नहीं देगा कि “हम अभी क्या बन गए हैं”।

एक अमीर बाप का बेटा अगर नशड़ी हो जाए, और चौराहे पर खड़े होकर चिल्लाये—“तुम्हें पता है मेरा बाप कौन था?”—तो दुनिया उसे इज़्ज़त नहीं देती, उस पर हंसती है। आज दुनिया हम पर हंस रही है। क्योंकि हम काम करने के बजाय अपने दादाजी के मेडल दिखा रहे हैं।

1.2 नफरत का आइना (The Mirror of Hate)

आज एक औसत उत्तर भारतीय युवा से पूछो—”तुम कौन हो?” वो यह नहीं कहेगा कि “मैं एक इंजीनियर हूँ” या “मैं एक लेखक हूँ” या “मैं एक किसान हूँ”। उसका जवाब, उसकी पूरी पहचान, अब एक “नकारात्मक” (Negative) चीज़ पर टिक गई है।

आज का ‘गर्वित हिंदू’ अक्सर वह है जो मुसलमान से नफरत करता है। आज का ‘राष्ट्रवादी’ वह है जो ‘लिबरल’ को गाली देता है।

ज़रा एक मिनट रुककर सोचो। यह परजीवी पहचान (Parasitic Identity) है। परजीवी वो होता है जो दूसरे के शरीर पर ज़िंदा रहता है। अगर कल भारत से सारे मुसलमान गायब हो जाएं, सारे पाकिस्तान खत्म हो जाएं, और सारे वामपंथी मिट जाएं—तो तुम्हारे पास क्या बचेगा? तुम्हारी राजनीति, तुम्हारे जोश, तुम्हारे नारे—सबका आधार “दूसरा” (The Other) है। अगर वो नहीं, तो तुम शून्य।

यह कमज़ोरी की निशानी है। एक शेर को अपनी ताकत दिखाने के लिए किसी चूहे से नफरत करने की ज़रूरत नहीं होती। वो बस शेर होता है। स्वामी विवेकानंद का हिंदुत्व “नफरत” पर नहीं, “आत्म-विश्वास” (Self-Confidence) पर टिका था। आज का हिंदुत्व “डर” और “प्रतिक्रिया” (Reaction) पर टिका है।

तुम सुबह उठते हो, फोन उठाते हो, और ढूंढते हो कि आज किससे नफरत करनी है। आज किस फिल्म का बायकॉट करना है? आज किस विज्ञापन पर गुस्सा होना है? तुम्हारी जवानी की ऊर्जा, जो कोई नया ऐप बनाने में, कोई बिज़नेस खड़ा करने में, या अपनी बॉडी बनाने में लगनी चाहिए थी—वो ट्विटर (X) के ट्रोल्स को जवाब देने में जल रही है। तुम “योद्धा” नहीं हो, तुम “प्यादे” (Pawn) हो। जिसका इस्तेमाल कोई और अपनी सत्ता बचाने के लिए कर रहा है।

1.3 “भावनाएं आहत हैं” का धंधा (The Offense Industry)

मुझे यह बात कभी समझ नहीं आई। हम कहते हैं कि हमारा धर्म “सनातन” है—यानी जो आदि है, अनंत है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता। और फिर, एक कॉमेडियन के मज़ाक से, एक फिल्म के सीन से, या एक रंग (बेशर्म रंग) से—हमारा धर्म खतरे में पड़ जाता है?

भाई, अगर तुम्हारी आस्था इतनी कांच जैसी है कि एक पत्थर से टूट जाए, तो वो आस्था नहीं, अहंकार है। सच्ची आस्था बुलेटप्रूफ होती है। उसे किसी के मज़ाक से फर्क नहीं पड़ता।

यह “आहत होने” (Getting Offended) का नाटक एक “धंधा” (Industry) बन चुका है। तुम्हें जानबूझकर “नाजुक” (Fragile) बनाया जा रहा है। क्यों? क्योंकि एक “आहत” आदमी तार्किक सवाल नहीं पूछता। जब तुम गुस्से में होते हो कि “पठान फिल्म में भगवा बिकिनी क्यों थी?”, तो तुम यह पूछना भूल जाते हो कि “मेरे शहर में पानी साफ़ क्यों नहीं आ रहा?”

यह ध्यान भटकाने की कला (Art of Distraction) है। सरकारें, चाहे वो किसी भी पार्टी की हों, अपनी नाकामी छुपाने के लिए तुम्हें “धर्म” की ढाल देती हैं। तुम्हें लगता है तुम धर्म की रक्षा कर रहे हो? नहीं। तुम सिर्फ़ एक भ्रष्ट सिस्टम की रक्षा कर रहे हो जो तुम्हें गरीब बनाए रखना चाहता है।

निष्कर्ष: आईना साफ़ करो

मैं यह सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ तुम जीतो। मैं चाहता हूँ तुम अमीर बनो। मैं चाहता हूँ तुम दुनिया घूमो। मैं चाहता हूँ तुम अपनी शर्तों पर जियो। और यह तब तक नहीं होगा जब तक तुम “पहचान के इस धोखे” से बाहर नहीं निकलोगे।

  1. भूतकाल को म्यूज़ियम में रखो, सर पर नहीं।
  2. अपनी पहचान अपनी “काबिलियत” पर बनाओ, नफरत पर नहीं।
  3. छोटी-छोटी बातों पर आहत होना बंद करो। अपनी चमड़ी मोटी करो। दुनिया बहुत सख्त है।

अगले अध्याय में हम बात करेंगे उस पिंजरे की जिसे तुमने “सुरक्षा” मान लिया है। भगवा पिंजरा।

— तुम्हारा भाई।

अध्याय 10: नई शुरुआत (Nayi Shuruwat)

“बीमारी का इलाज तब तक शुरू नहीं हो सकता, जब तक मरीज़ यह न मान ले कि वो बीमार है।”


10.1 आईना देखना (Facing the Mirror)

राघव, हमने पिछले 9 अध्यायों में बहुत कड़वी बातें कीं। हमने पहचान के धोखे, भगवा पिंजरे, खानदान की गुलामी और सरकारी नौकरी के चक्रव्यूह को देखा। शायद तुम्हें गुस्सा आया होगा। शायद तुम्हें लगा होगा कि मैं अपने ही देश की बुराई कर रहा हूँ।

लेकिन भाई, कड़वी दवा ही जान बचाती है। आज का सबसे बड़ा सच यह है: हमारा समाज बीमार है।

हम चिल्लाते हैं कि हम “विश्वगुरु” हैं, लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया की खुशहाली (Happiness Index) में हम 120वें नंबर पर आते हैं। हम गर्व करते हैं कि हम 5वीं सबसे बड़ी इकॉनमी हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) में हम आज भी बांग्लादेश और वियतनाम से पीछे हैं। हमारे बच्चे कुपोषित हैं, हमारी हवा ज़हरीली है, और हमारी अदालतें न्याय देने में 30 साल लगा देती हैं।

जब तक हम इस “विश्वगुरु” वाले अहंकार (Ego) को नहीं मारेंगे, हम कभी सुधार की शुरुआत नहीं कर पाएंगे। अहंकार इंसान को अंधा बना देता है। विनम्रता (Humility) इंसान को सीखने के काबिल बनाती है। चलो, आज इस पुराने अहंकार का विसर्जन करते हैं और ज़मीन पर खड़े होकर हकीकत का सामना करते हैं।

10.2 शून्य से शुरुआत (Zero-Based Thinking)

ज़रा एक पल के लिए सोचो। अगर आज हमें भारत को दोबारा से बनाना हो—बिल्कुल नए सिरे से—तो क्या हम इसमें ‘जाति’ को रखेंगे? क्या हम इसमें ‘दहेज़’ को जगह देंगे? क्या हम इसमें ऐसा कानूनी सिस्टम बनाएंगे जो सिर्फ़ अमीरों की सुने? जवाब है—नहीं।

तो फिर हम इन सड़ी-गली चीज़ों को ढो क्यों रहे हैं? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि यह “परंपरा” है? भाई, परंपरा वो मशाल होनी चाहिए जो रास्ता दिखाए, वो बेड़ी नहीं होनी चाहिए जो पैर जकड़ ले।

जो काम का नहीं है, उसे छोड़ दो। जो तुम्हें कमज़ोर बनाता है, उसे आग लगा दो। तीसरा रास्ता (Path 3) का पहला नियम यही है: “अतीत का सम्मान करो, पर भविष्य का सौदा मत करो।”

10.3 “नया भारतीय” कौन है? (The New Indian)

अब समय आ गया है कि हम उस ‘तीसरे भारतीय’ को परिभाषित करें जिसके लिए यह पूरी किताब लिखी गई है। वो “नया भारतीय” तुम हो सकते हो। उसकी तीन पहचान हैं:

  1. वो “बिना-हाइफन” वाला भारतीय है (Unhyphenated): वो यह नहीं कहता कि मैं ‘ब्राह्मण-भारतीय’ हूँ या ‘हिंदू-भारतीय’ या ‘यादव-भारतीय’ हूँ। वो सिर्फ़ एक नागरिक (Citizen) है। उसकी पहली और आखिरी वफ़ादारी भारत के संविधान और सत्य (Truth) के प्रति है।

  2. वो “तर्कशील” है (Ruthlessly Rational): वो किसी बाबा के पैर नहीं छूता। वो व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर यकीन नहीं करता। वो सबूत मांगता है। वो पूछता है—”क्यों?” वो मानता है कि विज्ञान ही गरीबी मिटाने का इकलौता रास्ता है।

  3. वो “संप्रभु” है (Sovereign): वो किसी नेता का ‘भक्त’ नहीं है। वो किसी पार्टी का ‘गुलाम’ नहीं है। वो अपने दिमाग, अपने शरीर और अपने पैसे का खुद मालिक है। वो ‘भीख’ नहीं मांगता, वो ‘वैल्यू’ (Value) क्रिएट करता है।

10.4 निदान पूरा हुआ, अब इलाज की बारी

राघव, हमने बीमारी पकड़ ली है। हमने देख लिया है कि हम कहाँ-कहाँ से टूटे हुए हैं। लेकिन सिर्फ़ बीमारी जानने से कुछ नहीं होगा। अब हमें अपने “दिमाग” को ठीक करना होगा।

अगले खंड (Volume 2) में हम बात करेंगे तुम्हारे ज़ेहन (Mind) की। हम सीखेंगे कि कैसे अपने सोचने के तरीके को अपडेट करना है। कैसे उन मानसिक गलतियों (Biases) से बचना है जो तुम्हें सदियों से बेवकूफ बना रही हैं।

क्या तुम अपना “सॉफ्टवेयर” अपडेट करने के लिए तैयार हो? चलो, खंड 2 की ओर बढ़ते हैं। सोच: ज़ेहन का नया सॉफ्टवेयर।

— तुम्हारा भाई।

अध्याय 2: भगवा पिंजरा (Bhagwa Pinjra)

“डरा हुआ इंसान नागरिक नहीं होता, वो सिर्फ एक ‘वोट’ होता है।”


2.1 डर का मनोविज्ञान (The Psychology of Fear)

राघव (एक काल्पनिक पाठक), मैं तुमसे एक सीधा सवाल पूछता हूँ। तुम्हारे पास केंद्र में सत्ता है। तुम्हारे पास राज्यों में सरकारें हैं। पुलिस तुम्हारी है। सेना तुम्हारी है। मीडिया तुम्हारी है। फिर भी… तुम डरे हुए क्यों हो?

व्हाट्सएप पर सुबह-सुबह जो मैसेज आता है—“जागो हिन्दू, नहीं तो मिट जाओगे”—वह तुम्हें किसके खिलाफ जगा रहा है? भारत की आबादी 140 करोड़ है। उसमें 100 करोड़ से ज्यादा हिंदू हैं। सोचो, 100 करोड़ लोग 20 करोड़ लोगों से कैसे डर सकते हैं? यह गणित (Math) काम नहीं करता।

यह डर असली नहीं है। यह “मैन्युफैक्चर्ड” (Manufactured) है। इसे फैक्ट्रियों में बनाया गया है और तुम्हारे मोबाइल पर डिलीवर किया गया है। क्यों? क्योंकि एक “सुरक्षित बहुसंख्यक” (Secure Majority) विकास मांगता है। वो पूछता है कि स्कूल कहां हैं, नौकरियां कहां हैं। लेकिन एक “डरा हुआ बहुसंख्यक” (Terrified Majority) सिर्फ ‘बचाव’ (Protection) मांगता है।

तुम्हें जानबूझकर “घेराबंदी” (Siege Mentality) में रखा जा रहा है। तुम्हें यह महसूस कराया जा रहा है कि तुम एक किले में हो और चारों तरफ दुश्मन हैं। जब इंसान को लगता है कि उसकी जान खतरे में है, तो वो यह नहीं देखता कि राजा ने कपड़े पहने हैं या नहीं। वो बस राजा के पैरों में गिर जाता है।

यह भगवा पिंजरा है। बाहर से यह पिंजरा ‘शक्ति’ जैसा दिखता है। रैलियां, डीजे, नारे, तलवारें। लेकिन अंदर से? अंदर से यह ‘असुरक्षा’ (Insecurity) है। यह एक शेर का पिंजरा नहीं है; यह एक डरे हुए खरगोश का बिल है जो शेर की खाल ओढ़कर बैठा है।

2.2 एक रंग की गलती (The Monolithic Error)

हिन्दू धर्म क्या था? यह एक जंगल (Rainforest) जैसा था। अव्यवस्थित, विशाल, और विविध। कहीं शिव की पूजा हो रही है, कहीं काली की, कहीं निराकार ब्रह्म की। कोई मांस खा रहा है, कोई उपवास कर रहा है। कोई मूर्ति पूज रहा है, कोई मूर्ति का खंडन कर रहा है (आर्य समाज)। यही हमारी ताकत थी। विविधता (Diversity) हमारी ढाल थी।

लेकिन आज की राजनीति क्या कर रही है? वो इस जंगल को काटकर एक ‘बागान’ (Plantation) बनाना चाहती है। जहां सारे पेड़ एक जैसे हों। एक ही ऊंचाई, एक ही रंग। “एक देश, एक धर्म, एक नेता।”

यह ‘सेमिटिक’ (Semitic) सोच है। यह अब्राहमिक धर्मों (इस्लाम/ईसाई) की नक़ल है। विडंबना देखो—हम जिनसे नफरत करते हैं (कट्टरपंथी इस्लाम), हम धीरे-धीरे वैसे ही बनते जा रहे हैं। वो एक किताब को मानते हैं? हम भी एक किताब को मानेंगे (हनुमान चालीसा/गीता का राजनीतिकरण)। वो भीड़ बनकर हमला करते हैं? हम भी भीड़ बनेंगे।

तुम अपने गाँव के कुल-देवता को भूलकर एक राजनीतिक ‘राम’ को अपना रहे हो। तुम अपनी स्थानीय परम्पराओं को ‘पिछड़ा’ मानकर एक ‘मानकीकृत’ (Standardized) हिंदुत्व को ओढ़ रहे हो। यह धर्म की रक्षा नहीं है, यह धर्म की हत्या है। हिंदू धर्म ‘खोज’ (Seeking) का धर्म था, ‘आदेश’ (Command) का नहीं। इस पिंजरे ने तुम्हें ‘खोजने वाला’ (Seeker) से बदलकर ‘मानने वाला’ (Believer) बना दिया है।

2.3 दक्षिण का नज़रिया (A View from the South)

मैं दक्षिण से हूँ। हमारे यहाँ मंदिर तुमसे ज़्यादा बड़े हैं। हमारे यहाँ अनुष्ठान तुमसे ज़्यादा सख्त हैं। लेकिन हमारे यहाँ धर्म राजनीति को नहीं चलाता।

तमिलनाडु में, हम मंदिर में ‘भक्त’ होते हैं, लेकिन वोट देते समय हम ‘तर्कशील’ (Rational) होते हैं। हम पूछते हैं: “भगवान अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं, तुम बताओ तुमने हॉस्पिटल बनाया या नहीं?”

उत्तर भारत की समस्या यह है कि तुमने धर्म को ‘आध्यात्मिक शांति’ की जगह ‘राजनीतिक पहचान’ बना दिया है। तुम्हें लगता है कि मस्जिद के सामने ज़ोर से डीजे बजाना ‘धर्म’ है? नहीं भाई, यह सिर्फ ‘ईगो’ (Ego) है। और ईगो सबसे बड़ी अशुद्धि है।

निष्कर्ष: पिंजरा तोड़ो

इस पिंजरे से बाहर निकलो। डरना बंद करो। तुम खतरे में नहीं हो। तुम्हारा धर्म खतरे में नहीं है। खतरे में है तो सिर्फ़ तुम्हारी “सोचने की शक्ति”

अगले अध्याय में हम बात करेंगे उस दूसरे पिंजरे की, जिसने तुम्हें गुलाम बनाकर रखा है—वो जो ‘खादी’ पहनता है और कहता है कि “सिर्फ मेरा बेटा ही राज करेगा।” खादी और खानदान।

अध्याय 3: खादी और खानदान (Khadi aur Khandaan)

“राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा… यह बात हमने किताबों में पढ़ी थी, वोटिंग मशीन पर नहीं।”


3.1 सामंतवाद का नया रूप (Modern Feudalism)

अगर भगवा पिंजरा ‘डर’ का है, तो खादी का पिंजरा ‘वफ़ादारी’ का है। हमारे देश में लोकतंत्र (Democracy) है, लेकिन हमारे दिमाग में आज भी राजशाही (Feudalism) है।

हम नेता नहीं चुनते, हम “मालिक” चुनते हैं। ज़रा अपने शहर के लोकल विधायक या सांसद को देखो। क्या वो जनता का सेवक लगता है? या वो किसी छोटे-मोटे रजवाड़े का नवाब लगता है? उसके आगे-पीछे 10 गाड़ियाँ। उसके पैरों में गिरते हुए कार्यकर्ता। उसकी एक डांट पर कांपते हुए अफसर।

और सबसे बड़ी बीमारी—“परिवारवाद” (Dynasty)। यह सिर्फ कांग्रेस की बात नहीं है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हर क्षेत्रीय पार्टी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई है। बाप अध्यक्ष, बेटा उपाध्यक्ष। पार्टी के बाकी लोग क्या हैं? वो ‘कर्मचारी’ हैं।

राघव, तुम सोचो। तुम दिन-रात मेहनत करते हो। तुम एग्जाम देते हो। तुम इंटरव्यू देते हो। लेकिन राजनीति में? वहां योग्यता (Merit) का कोई मतलब नहीं है। वहां सिर्फ एक योग्यता चाहिए—सही कोख (Womb) से पैदा होना।

यह “DNA का भ्रम” है। हम यह क्यों मान लेते हैं कि अगर बाप नेता था, तो बेटा भी नेता बनने लायक होगा? डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनने के लिए भी एग्जाम पास करता है। क्रिकेटर का बेटा अगर अच्छा न खेले, तो टीम से बाहर हो जाता है। लेकिन नेता का बेटा अगर चुनाव हार भी जाए, तो उसे राज्यसभा भेज दिया जाता है। वो कभी ‘फेल’ नहीं होता।

3.2 चमचागिरी की संस्कृति (The Ceiling of Sycophancy)

इस सिस्टम में टैलेंट का दम घुटता है। एक काबिल युवा जो देश बदलना चाहता है, वो राजनीति में क्यों नहीं आता? क्योंकि उसे पता है कि वो कितनी भी मेहनत कर ले, वो कभी ‘नंबर 1’ नहीं बन सकता। ‘नंबर 1’ की कुर्सी बेटे/बेटी के लिए आरक्षित (Reserved) है।

तो राजनीति में कौन बचता है? सिर्फ वो लोग जिनमें रीढ़ की हड्डी नहीं है। जो “जी हुज़ूर” करने में माहिर हैं। नतीजा? हमारे पास ‘लीडर’ नहीं हैं, हमारे पास ‘दरबारी’ (Courtiers) हैं।

जब संकट आता है, तो ये दरबारी फैसले नहीं ले पाते। क्योंकि इन्हें फैसले लेने की ट्रेनिंग नहीं मिली, इन्हें सिर्फ ‘आदेश मानने’ की ट्रेनिंग मिली है।

3.3 “माई-बाप” सरकार (The Mai-Baap Sarkar)

यह समस्या सिर्फ नेताओं की नहीं है। यह समस्या तुम्हारी भी है। तुम सरकार को क्या समझते हो? “माई-बाप।”

जब सरकार तुम्हें राशन देती है, या लैपटॉप देती है, या बिजली मुफ्त करती है… तो तुम क्या महसूस करते हो? “शुक्रिया साहब।” तुम एहसानमंद महसूस करते हो।

यही ग़लती है। सरकार तुम्हें कुछ अपनी जेब से नहीं दे रही। वो तुम्हारा पैसा है। तुम्हारा टैक्स है। (हाँ, अगर तुम इनकम टैक्स नहीं देते, तो भी तुम हर साबुन, हर पेट्रोल लीटर पर GST देते हो)।

जब तुम अपने पैसे से दुकान से सामान खरीदते हो, तो दुकानदार के पैर नहीं छूते। तो फिर उन नेताओं के पैर क्यों छूते हो जो तुम्हारे पैसे से तुम्हें ही सड़क या स्कूल बनाकर दे रहे हैं?

यह “प्रजा” (Subject) की मानसिकता है। एक ‘नागरिक’ (Citizen) और ‘प्रजा’ में यही फर्क है। प्रजा ‘भीख’ मांगती है। नागरिक ‘हिसाब’ मांगता है।

3.4 दक्षिण का नज़रिया (A View from the South)

दक्षिण भारत में भी परिवारवाद है (DMK, आदि)। मैं इससे इनकार नहीं करूँगा। लेकिन वहां एक फर्क है। वहां “परफॉरमेंस” (Performance) का दबाव है। अगर करुणानिधि का बेटा स्टालिन काम नहीं करेगा, तो जनता उसे घर बिठा देगी। वहां की जनता भावुक कम और सौदागर ज़्यादा है। “तुमने स्कूल बनाया? ठीक है, वोट ले लो। नहीं बनाया? तो तुम किसी के भी बेटे हो, बाहर जाओ।”

उत्तर भारत को यह सौदा करना सीखना होगा। भावुकता छोड़ो। वफ़ादारी छोड़ो। नेताओं को ऐसे ट्रीट करो जैसे तुम अपने प्लम्बर या इलेक्ट्रीशियन को करते हो। काम किया? अच्छा है। नहीं किया? अगला।

निष्कर्ष: अपनी रीढ़ सीधी करो

भगवा वाले तुम्हें डरा रहे हैं। खादी वाले तुम्हें खरीद रहे हैं। दोनों ही तुम्हें “छोटा” महसूस करा रहे हैं।

अगले अध्याय में हम बात करेंगे उस दीवार की जो तुम्हें दुनिया से काट रही है। वो झूठ जो तुम्हें बताया गया है कि “हिंदी हमारी शान है” जबकि उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। भाषा का चक्रव्यूह।

अध्याय 4: भाषा का चक्रव्यूह (Bhasha ka Chakravyuh)

“जिस भाषा में दुनिया व्यापार करती है, अगर तुम उस भाषा से नफरत करोगे, तो तुम सिर्फ मजदूर बनकर रह जाओगे।”


4.1 हिंदी का दोहरापन (The Hindi Paradox)

राघव, मैं तुमसे एक कड़वा सवाल पूछता हूँ। तुम्हारे जो नेता मंच पर खड़े होकर “हिंदी हमारी माता है” और “अंग्रेजी गुलामी की निशानी है” चिल्लाते हैं… ज़रा पता करो उनके बच्चे कौन से स्कूल में पढ़ते हैं?

99% चांस है कि उनके बच्चे दिल्ली के किसी इंटरनेशनल स्कूल में, या लंदन और न्यूयॉर्क की यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। वो तुम्हें ‘हिंदी’ का पाठ पढ़ा रहे हैं ताकि तुम उनके वोटर बने रहो, और अपने बच्चों को ‘अंग्रेजी’ सिखा रहे हैं ताकि वो तुम्हारे शासक (Ruler) बनें।

यह “दोहरापन” (Hypocrisy) है। हिंदी से प्यार करना अच्छी बात है। मैं तमिल हूँ, मैं अपनी भाषा से प्यार करता हूँ। लेकिन अंग्रेजी से नफरत करना? यह ‘देशभक्ति’ नहीं, यह ‘आत्महत्या’ है।

तुम अपनी गरीबी को ‘संस्कृति’ का नाम मत दो। आज की दुनिया का ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) अंग्रेजी है। कोडिंग अंग्रेजी में है। शेयर बाज़ार अंग्रेजी में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले अंग्रेजी में हैं। विज्ञान की रिसर्च अंग्रेजी में है। अगर तुम इस भाषा को नहीं सीखोगे, तो तुम दुनिया के ज्ञान के खजाने से बाहर रह जाओगे।

4.2 अंग्रेजी: गुलामी नहीं, हथियार (English as a Weapon)

उत्तर भारत के युवा के मन में एक ग्रंथि (Complex) बैठ गई है। उसे लगता है कि अंग्रेजी बोलना मतलब ‘अंग्रेज़’ बन जाना। गलत।

अंग्रेजी एक “स्किल” (Skill) है, जैसे ड्राइविंग या तैरना। जब तुम कार चलाते हो, तो तुम यह नहीं सोचते कि कार पश्चिमी देश की ईजाद है। तुम बस उसे एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हो कहीं पहुँचने के लिए। अंग्रेजी भी वही औज़ार है।

“अमीरपेट” (हैदराबाद) का एक उदाहरण देता हूँ: वहां रिजर्व बैंक के क्वार्टर में रहने वाले क्लर्क का बेटा अंग्रेजी सीखता है। वो इसे ‘गुलामी’ नहीं मानता। वो इसे “पासपोर्ट” मानता है—बंगलौर, मुंबई या अमेरिका जाने का पासपोर्ट। वो ‘इतिहास’ पर बहस नहीं करता। वो अपनी स्किल बढ़ाता है और निकल जाता है। और तुम? तुम यहाँ “हिंदी बचाओ” के नारे लगा रहे हो, जबकि तुम्हारी जेब खाली है।

तुम्हें अंग्रेजी इसलिए नहीं सीखनी कि तुम्हें शेक्सपियर पढ़ना है। तुम्हें अंग्रेजी इसलिए सीखनी है ताकि तुम अपनी बात दुनिया को सुना सको, अपना माल दुनिया को बेच सको, और अपना हक़ मांग सको। यह “जीत का हथियार” है। इसे दुश्मन के हाथ में मत छोड़ो। इसे छीन लो।

4.3 “शुद्ध हिंदी” की दीवार (The Artificial Barrier)

और जिस हिंदी के लिए तुम लड़ रहे हो, वो कौन सी हिंदी है? वो प्रेमचंद की हिंदी नहीं है। वो कबीर की हिंदी नहीं है। वो “सरकारी हिंदी” है।

सरकार ने हिंदी को इतना कठिन, इतना बोझिल और इतना बनावटी बना दिया है कि आज का युवा उससे नफरत करने लगा है। “लौह-पथ-गामिनी” (Train) जैसा शब्द किसी ने कभी नहीं बोला। हमने अपनी भाषा से उर्दू की नज़ाकत और अवधी की मिठास निकालकर उसे एक सूखी, सरकारी फ़ाइल बना दिया है।

बॉलीवुड क्यों चलता है? क्योंकि उसकी भाषा “हिंदुस्तानी” है। वो दिल की भाषा है। किताबें क्यों नहीं बिकतीं? क्योंकि उनकी भाषा “विद्वानों” की है।

भाई, अपनी जुबान को आसान करो। “हिंग्लिश” (Hinglish) बोलने में शर्म मत करो। अगर तुम एक वाक्य में हिंदी और अंग्रेजी मिलाकर बोलते हो, तो इसका मतलब है तुम्हारा दिमाग तेज़ है। तुम दो डिक्शनरी एक साथ इस्तेमाल कर रहे हो। भाषा का मकसद है बात समझाना, पांडित्य दिखाना नहीं।

4.4 दक्षिण का नज़रिया (A View from the South)

हम तमिल लोग अपनी भाषा को लेकर बहुत भावुक हैं। हम हिंदी का विरोध करते हैं। लेकिन क्यों? क्योंकि हम नहीं चाहते कि कोई हम पर अपनी भाषा थोपे। लेकिन हम अंग्रेजी का विरोध नहीं करते। क्यों? क्योंकि हमें पता है कि अंग्रेजी “न्यूट्रल” (तठस्थ) है। वो किसी की नहीं है। वो बाज़ार की भाषा है। तमिलनाडु के गांव का बच्चा भी अंग्रेजी सीखने की कोशिश करता है क्योंकि उसे चेन्नई की आईटी कंपनी में नौकरी चाहिए।

उत्तर भारत को यह व्यावहारिकता (Pragmatism) सीखनी होगी। हिंदी को घर में रखो, दिल में रखो। लेकिन जब करियर की जंग लड़ने जाओ, तो अंग्रेजी का कवच पहनकर जाओ। बिना कवच के युद्ध में जाओगे, तो मारे जाओगे।

निष्कर्ष

अगली बार जब कोई नेता तुम्हें अंग्रेजी के खिलाफ भड़काए, तो उससे पूछना: “सर, आपका बेटा कौन से मीडियम में पढ़ रहा है?”

अगले अध्याय में हम तुम्हारे जीवन के सबसे बड़े दर्द पर बात करेंगे। वो उम्मीद जो तुम्हें खा रही है। सरकारी नौकरी का नशा।

अध्याय 5: सरकारी नौकरी का नशा (Sarkari Naukri ka Nasha)

“जिसने कभी समंदर नहीं देखा, वो कुएं को ही दुनिया मान लेता है।”


5.1 मुखर्जी नगर का सच (The UPSC Trap)

राघव, मैं जानता हूँ तुम कहाँ हो। शायद तुम दिल्ली के मुखर्जी नगर के किसी छोटे से कमरे में हो, या पटना और प्रयागराज की किसी लाइब्रेरी में। तुम्हारे टेबल पर लक्ष्मीकांत की ‘पॉलिटी’ और विपिन चंद्रा की ‘इतिहास’ पड़ी है। तुम्हारी आंखों के नीचे काले घेरे हैं। तुम्हें घर से आए हुए 3 साल हो गए हैं।

तुम एक “चक्रव्यूह” में फंस गए हो। तुम्हें अंदर जाने का रास्ता तो पता था (कोचिंग, नोट्स, जोश), लेकिन बाहर निकलने का रास्ता किसी ने नहीं बताया।

आंकड़े (Data) देखो। 10 लाख बच्चे फॉर्म भरते हैं। 1000 सीटें हैं। सफलता की दर: 0.01%। गणित के हिसाब से, तुम्हारे IAS बनने से ज़्यादा चांस तुम्हारे ‘लॉटरी’ जीतने के हैं।

लेकिन तुम वहां क्यों बैठे हो? क्या तुम्हें प्रशासन (Administration) से प्यार है? क्या तुम सच में फाइलें साइन करना चाहते हो? शायद नहीं। तुम वहां इसलिए हो क्योंकि तुम्हें कोई और रास्ता पता ही नहीं है।

5.2 माहौल का जाल (The Environment Trap)

यह तुम्हारी गलती नहीं है। यह तुम्हारे “माहौल” की गलती है। इंसान वही बनने की सोचता है जो उसे अपने आसपास दिखाई देता है।

ज़रा अपनी खिड़की से बाहर देखो। तुम्हें अपने शहर (मिर्जापुर, जौनपुर, आरा) में “सफल” (Successful) आदमी कौन दिखता है?

  1. ठेकेदार (Contractor): जो फॉर्च्यूनर में घूमता है और नेताओं के साथ उठता-बैठता है।
  2. सरकारी बाबू: जिसके पास ‘ऊपरी कमाई’ है और समाज में रौब है।
  3. बाहुबली: जिससे सब डरते हैं।

तुम्हारे दिमाग ने यह गणित लगा लिया: “सफल होने का मतलब है—पावर (Power)। और पावर मिलती है सरकार से।” इसलिए तुम सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहे हो।

अब एक दूसरा नज़रिया देखो। हैदराबाद के ‘अमीरपेट’ या पुणे के किसी साधारण बैंक क्वार्टर में रहने वाले लड़के को देखो। उसका पिता भी तुम्हारे पिता जितना ही कमाता है। वो अमीर नहीं हैं। लेकिन जब वो अपनी खिड़की से बाहर देखता है, तो उसे क्या दिखता है?

  1. पड़ोस की दीदी जो जर्मनी पढ़ने गई हैं।
  2. चाचा जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और घर से काम करते हुए लाखों कमा रहे हैं।
  3. दोस्त जो एक स्टार्टअप चला रहा है।

उसका दिमाग अलग गणित लगाता है: “सफल होने का मतलब है—स्किल (Skill)।” वो UPSC की किताब नहीं खरीदता। वो कोडिंग सीखता है, वो जर्मन भाषा सीखता है, वो GRE की तैयारी करता है।

फर्क पैसे का नहीं है, राघव। फर्क “नक़्शे” (Map) का है। तुम्हारे पास जो नक्शा है, उसमें सिर्फ ‘सरकारी दफ्तर’ के रास्ते हैं। उसके पास जो नक्शा है, उसमें ‘पूरी दुनिया’ के रास्ते हैं।

5.3 पिता का प्यार और अज्ञान (Father’s Love, Father’s Ignorance)

तुम्हारे पिताजी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने शायद जमीन बेची होगी, माँ के गहने गिरवी रखे होंगे तुम्हें पढ़ाने के लिए। लेकिन उनका प्यार उनकी “अज्ञानता” (Ignorance) को नहीं मिटा सकता।

तुम्हारे पिताजी 1990 के नक्शे से 2025 का रास्ता खोज रहे हैं। उनके ज़माने में, उनके गाँव में, ‘कलेक्टर’ ही भगवान था। उनके लिए ‘प्राइवेट जॉब’ का मतलब था—असुरक्षा। उन्हें नहीं पता कि आज बंगलौर में बैठा एक 24 साल का लड़का, बिना किसी को सलाम ठोके, बिना रिश्वत लिए, कलेक्टर से ज़्यादा कमा रहा है और ज़्यादा खुश है।

वो तुम्हें गलत सलाह इसलिए नहीं दे रहे क्योंकि वो तुम्हारा बुरा चाहते हैं। वो गलत सलाह इसलिए दे रहे हैं क्योंकि उन्हें बेहतर विकल्प पता ही नहीं हैं। कुएं के मेंढक को समंदर का रास्ता नहीं पता होता।

5.4 अवसर की कीमत (Opportunity Cost)

तुम सोच रहे हो—”एक साल और कोशिश कर लेता हूँ।” लेकिन तुम यह नहीं देख रहे कि तुम क्या खो रहे हो। 22 से 28 साल की उम्र—यह इंसान की ज़िंदगी के सबसे ऊर्जावान साल होते हैं। इन सालों में एलन मस्क ने कंपनी बनाई थी। इन सालों में भगत सिंह ने क्रांति की थी। और तुम? तुम इन सालों को एक बंद कमरे में ‘बाबर और हुमायूँ’ की वंशावली रटने में जला रहे हो।

यह “जवानी का कब्रिस्तान” है। जब तुम 30 साल के होकर, 6 बार फेल होकर बाहर निकलोगे, तो तुम्हारे पास कोई स्किल नहीं होगी। तुम एक “फ्रस्ट्रेटेड” इंसान बन जाओगे जो सिस्टम को गाली देता है।

निष्कर्ष: चक्रव्यूह तोड़ो

राघव, दीवार को धक्का देना बंद करो। दरवाजा दूसरी तरफ है। दुनिया बहुत बड़ी है। इसमें राइटर, कोडर, शेफ, डिजाइनर, यूट्यूबर—हज़ारों रास्ते हैं। अपने पिता के सपने को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि तुम खुश और सफल बनो, न कि तुम वो बनो जो वो चाहते हैं।

जो तुम्हें दिखता नहीं, इसका मतलब यह नहीं कि वो है नहीं। नक्शा बदलो।

अगले अध्याय में हम उस जंजीर की बात करेंगे जो तुम्हें यह नक्शा बदलने से रोक रही है। “संस्कार” की बेड़ियाँ।

अध्याय 6: “संस्कार” की बेड़ियाँ (Sanskaar ki Bediyan)

“हमारे समाज में ‘अच्छे बच्चे’ वो नहीं जो सच बोलते हैं, बल्कि वो हैं जो चुप रहते हैं।”


6.1 आज्ञाकारिता का बोझ (The Burden of Obedience)

राघव, बचपन से तुम्हें क्या सिखाया गया? “बड़ों के सामने जुबान मत लड़ाओ।” “पिताजी ने जो कहा, वही पत्थर की लकीर है।” “ज्यादा सवाल मत पूछो।”

तुम्हें एक “आदर्श बालक” (Ideal Child) बनाने की ट्रेनिंग दी गई। लेकिन सच बताऊँ? तुम्हें एक “आज्ञाकारी रोबोट” बनाने की ट्रेनिंग दी गई।

समस्या यह है कि 21वीं सदी “रोबोट्स” की नहीं, “बागियों” (Rebels) की है। जिन लोगों ने गूगल, एप्पल, या टेस्ला बनाई—क्या वो ‘आज्ञाकारी’ थे? नहीं। उन्होंने पुराने नियमों को तोड़ा। उन्होंने सवाल पूछे। लेकिन तुमने सवाल पूछना छोड़ दिया।

जब तुम घर में पिता के गलत फैसले पर सवाल नहीं उठा पाते, तो तुम दफ्तर में बॉस के गलत फैसले पर सवाल कैसे उठाओगे? तुम्हारी ‘रीढ़ की हड्डी’ (Spine) घर के ड्राइंग रूम में ही तोड़ दी गई है। तुम “सम्मान” (Respect) और “गुलामी” (Submission) के बीच का फर्क भूल गए हो। पैर छूना सम्मान है। अपना दिमाग गिरवी रख देना गुलामी है।

6.2 “लोग क्या कहेंगे” (The Social Virus)

यह भारत की सबसे बड़ी बीमारी है। तुम्हारे जीवन के सबसे बड़े फैसले—तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारी नौकरी, तुम्हारी शादी—तुम नहीं लेते। वो एक अदृश्य अदालत लेती है जिसे कहते हैं: “समाज”

  • “अगर मैंने इंजीनियरिंग छोड़ी, तो मामाजी क्या कहेंगे?”
  • “अगर मैंने दूसरी जाति में शादी की, तो गाँव वाले क्या कहेंगे?”

राघव, मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूँ। जिन ‘मामाजी’ और ‘गाँव वालों’ के डर से तुम अपनी खुशी मार रहे हो, क्या वो तुम्हारी EMI भरेंगे? क्या जब तुम रात को उदास होकर लेटोगे, तो वो तुम्हें सुलाने आएंगे? नहीं।

तुम अपनी ज़िंदगी उन लोगों को इम्प्रेस करने में बर्बाद कर रहे हो जो तुम्हें पसंद भी नहीं करते। यह “दिखावे की इकॉनमी” है।

6.3 शादियों का तमाशा (The Wedding Circus)

इसका सबसे भद्दा रूप हमारी शादियों में दिखता है। एक पिता अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई—30 साल की मेहनत—सिर्फ 3 दिन के तमाशे में फूंक देता है। क्यों? ताकि वो रिश्तेदारों को दिखा सके कि उसकी “नाक” ऊंची है।

सोचो, अगर वो 20 लाख रुपये शादी के टेंट और खाने में न लगाकर, बेटी के नाम पर एक फिक्स्ड डिपॉजिट कर दिए जाते, या उसे बिज़नेस शुरू करने के लिए दिए जाते—तो उसकी ज़िंदगी बदल जाती। लेकिन नहीं। हमें “इज़्ज़त” चाहिए। भले ही उस इज़्ज़त के लिए अगले 5 साल कर्ज़ चुकाना पड़े।

यह संस्कार नहीं है। यह “आत्महत्या” है। हम अपनी अगली पीढ़ी को गरीब बना रहे हैं, सिर्फ पड़ोसियों की वाह-वाही लूटने के लिए।

6.4 भावनात्मक ब्लैकमेल (Emotional Blackmail)

जब तुम इन जंजीरों को तोड़ने की कोशिश करोगे, तो तुम्हें रोकने के लिए एक हथियार इस्तेमाल होगा: “आंसू”“हमने तुम्हारे लिए इतना किया, और तुम हमारी इतनी सी बात नहीं मान सकते?” “तुम्हारी वजह से मेरी बीपी बढ़ गई है।”

यह प्यार नहीं है, राघव। यह “कंट्रोल” है। सच्चा प्यार वो है जो तुम्हें आज़ाद करे, न कि तुम्हें बांधे। तुम्हारे माता-पिता बुरे नहीं हैं, लेकिन वो डरे हुए हैं। उन्हें लगता है कि ‘लकीर से हटकर’ चलना खतरनाक है। तुम्हें उन्हें समझाना होगा—या कभी-कभी, उन्हें अनसुना करके आगे बढ़ना होगा।

निष्कर्ष: बेड़ियाँ तोड़ो

संस्कार का मतलब है बड़ों का आदर करना, कमज़ोर की मदद करना, सच बोलना। संस्कार का मतलब यह नहीं है कि तुम अपनी सोच, अपनी खुशी और अपने भविष्य का गला घोंट दो।

बाहों में संस्कार रखो, लेकिन पैरों में बेड़ियाँ नहीं। उड़ना सीखो।

अगले अध्याय में हम उस सबसे गहरे सच पर बात करेंगे जो हमारे समाज की रग-रग में बसा है, लेकिन जिस पर हम बात नहीं करते। जाति का हिसाब।

अध्याय 7: जाति का हिसाब (Jaati ka Hisaab)

“हम कहते हैं कि जाति जा चुकी है, लेकिन शादी के विज्ञापन के पन्ने कुछ और ही कहानी सुनाते हैं।”


7.1 छुपा हुआ ऑपरेटिंग सिस्टम (The Hidden OS)

राघव, अगर मैं तुमसे पूछूं कि “तुम जाति मानते हो?”, तो तुम शायद कहोगे—”नहीं, मैं आधुनिक हूँ।” लेकिन चलो एक टेस्ट करते हैं।

जब तुम किसी नए आदमी से मिलते हो, और उसका नाम पूछते हो, तो तुम्हारा दिमाग क्या करता है? जैसे ही वो कहता है—”मिश्रा” या “यादव” या “जाधव”—तुम्हारे दिमाग में एक घंटी बजती है। तुम उसे एक “खाने” (Box) में डाल देते हो। “अच्छा, यह हमारे जैसा है।” या “यह हमसे नीचे है।” या “यह बाहुबली है।”

यह “जाति का स्कैन” है। यह हमारे दिमाग का ऑपरेटिंग सिस्टम है जो बैकग्राउंड में हमेशा चलता रहता है। उत्तर भारत में, “आप कहाँ से हैं?” सवाल गाँव का पता पूछने के लिए नहीं, आपकी जाति पूछने के लिए किया जाता है।

7.2 मेरिट का झूठ (The Myth of Merit)

अक्सर “सवर्ण” (Upper Caste) लोग कहते हैं: “आरक्षण (Reservation) ने देश बर्बाद कर दिया। मेरिट की कद्र नहीं रही।”

भाई, ज़रा ‘मेरिट’ को ध्यान से देखो। एक बच्चा है जिसके घर में 3 पीढ़ियों से लोग पढ़े-लिखे हैं। घर में अंग्रेजी बोली जाती है। किताबें हैं। कंप्यूटर है। दूसरा बच्चा है जिसके दादाजी को स्कूल के बाहर बिठाया जाता था। जिसके बाप ने मज़दूरी की। जिसके घर में आज भी बिजली नहीं है।

अगर ये दोनों 100 मीटर की दौड़ दौड़ें, और पहला बच्चा जीत जाए—तो क्या वो उसकी ‘मेरिट’ है? नहीं। वो उसका “विशेषाधिकार” (Privilege) है। उसने जूते पहनकर दौड़ लगाई, दूसरे ने नंगे पैर कांटों पर।

जब तुम कहते हो “मुझे सिर्फ टैलेंट दिखता है”, तो तुम उस हज़ारों साल के इतिहास को मिटाने की कोशिश कर रहे हो जिसने तुम्हें यहाँ पहुँचाया है। आरक्षण गरीबी हटाने की स्कीम नहीं है। वो “हिस्सेदारी” (Representation) का हक़ है। सत्ता में, दफ्तर में, और कॉलेज में।

7.3 जाति एक नेटवर्क है (Caste as a Network)

जाति सिर्फ छुआछूत नहीं है। आज के दौर में जाति एक “क्लब” है। तुम्हें मकान किराए पर चाहिए? मकान मालिक तुम्हारी जाति देखेगा। तुम्हें प्राइवेट नौकरी चाहिए? बॉस अपनी जाति के लड़के को प्रेफरेंस देगा। तुम्हें बिज़नेस के लिए लोन चाहिए? बनिया बनिये को देगा।

यह एक “गिल्ड” (Guild) है। और यह गिल्ड टैलेंट को मारता है। क्योंकि जब हम सिर्फ ‘अपनों’ को प्रमोट करते हैं, तो हम बाहर के ‘जीनियस’ को रोक देते हैं। यही वजह है कि भारत की कई लाला कंपनियां (Family Businesses) बड़ी होकर डूब जाती हैं—क्योंकि वहां ‘खून’ को ‘दिमाग’ से ऊपर रखा जाता है।

7.4 जाति का अंत (The Death of Caste)

जाति कैसे मरेगी? सिर्फ साथ खाना खाने से नहीं मरेगी। यह तब मरेगी जब “रोटी और बेटी” का रिश्ता होगा।

जब तक हम शादियों में जाति का फिल्टर लगाएंगे, जाति ज़िंदा रहेगी। तुम “हिन्दू एकता” की बात करते हो, लेकिन अपनी बेटी की शादी किसी दलित से करने में तुम्हारी रूह कांप जाती है। यह कैसा धर्म है जो अपने ही लोगों को गले लगाने से डरता है?

राघव, अगर तुम सच में एक “नया भारत” बनाना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी जाति को अपने नाम के पीछे से हटाना होगा। सिर्फ कागज पर नहीं, दिल से। अपनी ‘ट्राइब’ (Tribe) जाति के आधार पर नहीं, “विचारों” (Values) के आधार पर बनाओ।

निष्कर्ष

जाति तुम्हें ‘सुरक्षा’ देती है, लेकिन वो तुम्हें ‘छोटा’ भी बनाती है। वो तुम्हें इंसान से पहले एक ‘लेबल’ बना देती है। उस लेबल को फाड़ दो।

अगले अध्याय में हम उन लोगों की बात करेंगे जो तुम्हारे इस डर और कन्फ्यूजन का फायदा उठाते हैं। बाबाओं का बाज़ार।

अध्याय 8: बाबाओं का बाज़ार (Chamatkar ka Vyapar)

“जब तर्क सो जाता है, तो चमत्कार का धंधा शुरू होता है।”


8.1 दिमाग का किराया (Outsourcing Logic)

राघव, तुम एक पढ़े-लिखे इंसान हो। तुमने विज्ञान पढ़ा है। तुम जानते हो कि धरती गोल है और गृह तारों के चक्कर लगाते हैं। फिर ऐसा क्यों है कि जब तुम्हारी नौकरी नहीं लगती, या शादी में देरी होती है, तो तुम एक अंगूठी (Gemstone) खरीद लेते हो?

क्या तुम्हें वाकई लगता है कि एक पत्थर का टुकड़ा तुम्हारी किस्मत बदल देगा? नहीं। अंदर ही अंदर तुम जानते हो कि यह झूठ है। फिर तुम वहां क्यों जाते हो?

क्योंकि तुम डरे हुए हो। और डरा हुआ इंसान सोचना बंद कर देता है। उसे बस एक ‘दिलासा’ (Comfort) चाहिए। बाबा और ज्योतिषी तुम्हें वही दिलासा बेचते हैं। तुम अपना दिमाग उन्हें “किराये” पर दे देते हो। “बाबाजी, आप बताइए मुझे क्या करना है।”

यह भक्ति नहीं है। यह “मानसिक आलस” (Mental Laziness) है। खुद जिम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं है, इसलिए ज़िम्मेदारी ग्रहों पर डाल दी।

8.2 डर का धंधा (The Business of Anxiety)

यह एक बहुत बड़ा बाज़ार है। भारत में ‘धर्म’ का बाज़ार ‘शिक्षा’ के बाज़ार से बड़ा हो सकता है। अरबों रुपये जो स्कूलों, अस्पतालों और स्टार्टअप्स में लगने चाहिए थे, वो मंदिरों के दान-पेटी और बाबाओं के आश्रमों में जा रहे हैं।

ज़रा सोचो। “शनि भारी है” — यह एक मार्केटिंग लाइन है। इसका मकसद तुम्हें डराना है ताकि तुम उनकी सर्विस (पूजा/यज्ञ) खरीदो। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे एक एंटीवायरस कंपनी तुम्हें वायरस से डराती है।

फर्क सिर्फ इतना है कि एंटीवायरस काम करता है। शनि की पूजा से तुम्हारी नौकरी नहीं लगेगी। नौकरी स्किल (Skill) से लगेगी।

8.3 गुरु का जाल (The Guru Trap)

असली गुरु वो है जो तुम्हें “आज़ाद” करे। जो तुम्हें सिखाए कि अपने फैसले खुद कैसे लेने हैं। लेकिन आज के ‘मार्केट गुरु’ तुम्हें “गुलाम” बनाते हैं। वो चाहते हैं कि तुम हर छोटे फैसले के लिए उनके पास आओ। “बाबाजी, गाड़ी कौन से रंग की लूँ?” “बाबाजी, गृह प्रवेश कब करूँ?”

तुमने अपनी ‘एजेंसी’ (Agency) खो दी है। तुम एक रिमोट-कंट्रोल खिलौने बन गए हो जिसका रिमोट किसी आश्रम में बैठा आदमी चला रहा है।

निष्कर्ष: अपनी मशाल खुद बनो

गौतम बुद्ध ने कहा था: “अप्प दीपो भव” (अपना प्रकाश स्वयं बनो)। तुम्हें किसी मसीहा की ज़रूरत नहीं है। तुम्हारे पास तर्क है। तुम्हारे पास मेहनत करने वाले हाथ हैं। चमत्कार का इंतज़ार मत करो। चमत्कार होते नहीं हैं, चमत्कार किये जाते हैं—मेहनत से।

अगले अध्याय में हम बात करेंगे उस जगह की जहाँ लोगों ने मंदिर से ज्यादा स्कूल को महत्व दिया, और आज वो हमसे आगे हैं। दक्षिण का नज़रिया।

अध्याय 9: दक्षिण का नज़रिया (Dakshin ka Nazariya)

“हमने मंदिर नहीं तोड़े, हमने सिर्फ़ स्कूल को मंदिर से बड़ा बना दिया।”


9.1 एक तमिल भाई की चिट्ठी (A Letter from the South)

मेरे भाई राघव,

अक्सर उत्तर भारत में लोग सोचते हैं कि हम दक्षिण भारतीय थोड़े ‘अजीब’ हैं। हम अपनी भाषा के लिए लड़ जाते हैं, हम हिंदी का विरोध करते हैं, और हम तुम्हारी राजनीति में फिट नहीं बैठते। लेकिन ज़रा एक पल के लिए राजनीति को किनारे रखो और डेटा (Data) देखो।

  • भारत के टॉप 10 इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज कहाँ हैं? (ज्यादातर दक्षिण में)।
  • भारत की सबसे बड़ी IT कंपनियाँ कहाँ हैं? (बंगलौर, चेन्नई, हैदराबाद)।
  • किस हिस्से में बच्चे कम मरते हैं और लोग ज़्यादा साल जीते हैं? (दक्षिण में)।

यह कोई जादू नहीं है। यह एक “चुनाव” (Choice) का नतीजा है।

9.2 इतिहास बनाम भविष्य (History vs Future)

उत्तर भारत और दक्षिण भारत में एक बुनियादी फर्क है। उत्तर भारत आज भी 12वीं सदी की लड़ाई लड़ रहा है। “उस राजा ने क्या किया? उस मंदिर को किसने तोड़ा? 400 साल पहले कौन हारा?” तुम आज भी इतिहास को ‘ठीक’ करने में लगे हो।

दक्षिण भारत ने यह तय किया कि हम 21वीं सदी की लड़ाई लड़ेंगे। हमने अपनी ऊर्जा मूर्तियों और स्मारकों पर खर्च करने के बजाय ‘लैबोरेटरी’ और ‘फैक्ट्री’ खड़ी करने में लगा दी। हमारा मानना है कि भगवान अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं, पर एक गरीब बच्चे की रक्षा सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य कर सकते हैं।

9.3 मिड-डे मील की क्रांति (The Power of Nutrition)

तमिलनाडु से तुम्हें एक बहुत बड़ी सीख मिल सकती है। 1950 के दशक में, हमारे नेता कामराज (Kamaraj) ने एक साधारण सा सवाल पूछा: “एक भूखा बच्चा स्कूल कैसे पढ़ेगा?” उन्होंने स्कूलों में मुफ्त खाने (Mid-Day Meal) की शुरुआत की।

उस समय ‘विद्वानों’ ने कहा कि यह पैसे की बर्बादी है। लेकिन आज? आज तमिलनाडु का मजदूर भी पढ़ा-लिखा है। आज वहां के हर गाँव में एक डॉक्टर है। हमने ‘नारे’ नहीं लगाए, हमने ‘पोषण’ (Nutrition) पर काम किया। क्योंकि हमें पता है कि दिमाग तभी चलता है जब पेट भरा हो।

9.4 पेरियार का ‘आत्म-सम्मान’ (The Periyar Shock)

तुमने शायद पेरियार (Periyar) के बारे में सुना होगा। उत्तर भारत में उन्हें अक्सर ‘धर्म-विरोधी’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन पेरियार का असली मक़सद नास्तिकता नहीं था। उनका मक़सद था—आत्म-सम्मान (Self-Respect)

उन्होंने तमिलों से कहा: “अगर कोई शास्त्र तुम्हें नीच कहता है, तो वो शास्त्र गलत है। अगर कोई रस्म तुम्हारी इज़्ज़त कम करती है, तो उस रस्म को जला दो।” इस एक विचार ने तमिलनाडु के पिछड़े और दलित वर्गों में वो आग भर दी कि उन्होंने ‘भीख’ मांगना छोड़कर ‘हक़’ मांगना शुरू कर दिया। यही वजह है कि दक्षिण में जाति आज भी है, पर वो ‘जुल्म’ नहीं कर सकती जो उत्तर भारत में करती है। वहां लोग अपनी जाति से ऊपर अपनी “काबिलियत” को रखते हैं।

9.5 संघीय ढांचा (Federalism)

हम दिल्ली की बात क्यों नहीं मानते? क्योंकि हम मानते हैं कि भारत एक “गुलदस्ता” है, “एक रंग का कैनवास” नहीं। हमने अपनी भाषा (तमिल) को बचाया, इसलिए नहीं कि हम हिंदी से नफरत करते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि भाषा ही हमारी रूह है। और अपनी रूह को बचाते हुए भी हमने अंग्रेजी सीखी ताकि हम दुनिया जीत सकें।

हम चाहते हैं कि जौनपुर और आरा का लड़का भी उतना ही काबिल बने जितना बंगलौर का। लेकिन वो तब तक नहीं होगा जब तक तुम “भावनाओं” की राजनीति छोड़कर “नतीजों” की राजनीति (Politics of Outcomes) नहीं करोगे।

निष्कर्ष

राघव, दक्षिण कोई दूसरा देश नहीं है। वो तुम्हारा ही हिस्सा है। लेकिन वो हिस्सा है जो ‘भविष्य’ में जी रहा है। तुम इतिहास की धूल झाड़ो और हमारे साथ आओ। हमें मिलकर एक ऐसा भारत बनाना है जहाँ मंदिर में शांति हो, पर सड़क पर विज्ञान हो।

अगले अध्याय में हम इस पूरी चर्चा को समेटेंगे और उस “नये भारतीय” की परिभाषा लिखेंगे जिसे कोई डरा नहीं सकता। नई शुरुआत।

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