खंड 3: जीवन (The Life)
अध्याय 1: अंग्रेजी: जीत का हथियार (English as a Weapon)
“अंग्रेजी को ‘विदेशी’ कहना छोड़ो, इसे अपनी ‘तरक्की’ की चाबी मानो।”
1.1 सत्ता की चाबी (Key to Power)
राघव, मैं तुमसे एक सीधी बात कहता हूँ। दुनिया “ज्ञान” (Knowledge) से चलती है। और आज की तारीख में, दुनिया का 99% ज्ञान—इंटरनेट, विज्ञान, कानून, कोडिंग, फाइनेंस—अंग्रेजी भाषा में कैद है।
अगर तुम अंग्रेजी नहीं सीखते, तो तुम उस खजाने के दरवाजे पर ताला लगाकर खड़े हो। तुम्हें चाबी फेंकनी नहीं है, चाबी छीननी है।
अंग्रेजी कोई भाषा नहीं है। यह एक “स्किल” (Skill) है। जैसे तैरना, गाड़ी चलाना या एक्सेल (Excel) आना। क्या तुम गाड़ी चलाते वक़्त सोचते हो कि “यह इंजन तो विदेशी है, मैं बैलगाड़ी चलाऊंगा”? नहीं। तो फिर भाषा के मामले में यह ज़िद क्यों?
एक कड़वा सच सुनो। एक कॉल-सेंटर में काम करने वाला लड़का, जो अच्छी अंग्रेजी बोलता है, वो हिंदी के प्रोफेसर से ज्यादा पैसे कमाता है। तुम इस सच से नफरत कर सकते हो, लेकिन तुम इसे बदल नहीं सकते। बाज़ार (Market) भावुक नहीं होता। बाज़ार उसी को पैसा देता है जो दुनिया से बात कर सके।
1.2 “कॉन्वेंट” का घमंड तोड़ना
तुम्हें अंग्रेजी से डर क्यों लगता है? क्योंकि हमारे देश में कुछ “काले अंग्रेज़” हैं—लुटियंस दिल्ली और दक्षिण मुंबई के एलीट—जो अंग्रेजी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं तुम्हें छोटा महसूस कराने के लिए। वो तुम्हारे लहज़े (Accent) का मज़ाक उड़ाते हैं।
भाई, उनके जाल में मत फंसो। अंग्रेजी बोलने के लिए अंग्रेज बनना ज़रूरी नहीं है। गूगल (Google) और माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) के CEO भारतीय हैं। वो भारतीय लहज़े में अंग्रेजी बोलते हैं, और पूरी दुनिया उन्हें सुनती है।
महत्वपूर्ण यह है कि तुम “क्या” (Content) बोल रहे हो, यह नहीं कि तुम “कैसे” (Accent) बोल रहे हो। टूटी-फूटी बोलो। गलत बोलो। लेकिन बोलो। शर्म छोड़ो। जो लोग तुम पर हंस रहे हैं, वो खुद डरे हुए हैं कि कहीं तुम आगे न निकल जाओ।
1.3 हिंग्लिश (Hinglish)
हम भारतीय हैं। हम दो भाषाओं में सोचते हैं। तो हम एक भाषा में क्यों बोलें? “हिंग्लिश” (Hindi + English) हमारी असली जुबान है। “Meeting pre-pone हो गई है।” — यह वाक्य व्याकरण (Grammar) में गलत हो सकता है, लेकिन बिज़नेस में एकदम सही है।
भाषा का मकसद है बात समझाना, पांडित्य दिखाना नहीं। अपनी हिंग्लिश पर गर्व करो। यह नए भारत की आवाज़ है।
अध्याय 2: माँ-बोली (The Mother Tongue)
“पेड़ कितना भी ऊंचा जाए, अगर जड़ें कट गईं तो वो गिर जाएगा।”
2.1 सरकारी हिंदी vs हिंदुस्तानी
तुम हिंदी से प्यार करते हो, है न? लेकिन कौन सी हिंदी? वो जो सरकारी किताबों में लिखी है? “लौह-पथ-गामिनी”? ऐसी हिंदी ने ही युवाओं को हिंदी से दूर किया है।
हमें “हिंदुस्तानी” चाहिए। वो ज़ुबान जिसमें हम प्यार करते हैं, जिसमें हम गाली देते हैं, जिसमें हम सपने देखते हैं। वो ज़ुबान जिसमें प्रेमचंद ने ‘गोदान’ लिखा और अमिताभ बच्चन ने डायलॉग बोले। उसे बचाओ। उसे “शुद्ध” करने के चक्कर में मार मत डालो।
2.2 उर्दू हमारी है
कुछ लोग कहते हैं: “उर्दू मुसलमानों की भाषा है।” यह इतिहास का सबसे बड़ा झूठ है। उर्दू का जन्म दिल्ली और मेरठ की गलियों में हुआ था। यह इसी मिट्टी की बेटी है। इंकलाब जिंदाबाद (Inquilab Zindabad) का नारा उर्दू है। ‘सारे जहाँ से अच्छा’ उर्दू है।
अगर तुम अपनी ज़ुबान से उर्दू के लफ्ज़—’सुकून’, ‘इबादत’, ‘लिहाज़’—निकाल दोगे, तो तुम्हारी भाषा बेजान हो जाएगी। नफरत के चक्कर में अपनी विरासत (Heritage) मत जलाओ।
अध्याय 3: तीसरी आँख (The Third Language)
“एक नई भाषा सीखना एक नई आत्मा पाने जैसा है।”
3.1 दक्षिण से दोस्ती
राघव, तुम राष्ट्रवाद की बातें करते हो। लेकिन क्या तुमने कभी दक्षिण भारत की कोई भाषा सीखने की कोशिश की? तमिल? मलयालम? कन्नड़?
जब एक उत्तर भारतीय टूटी-फूटी तमिल बोलता है, तो वो चेन्नई में किसी का भी दिल जीत सकता है। यह असली राष्ट्रीय एकता है। भाषा वो पुल है जो “आर्य” और “द्रविड़” की पुरानी खाई को पाट सकता है।
3.2 दिमाग का योगा
वैज्ञानिक कहते हैं कि जो लोग दो या तीन भाषाएं जानते हैं (Polyglot), उनका दिमाग बुढ़ापे तक जवान रहता है। नई लिपि (Script) सीखना दिमाग के लिए जिम जाने जैसा है। सिर्फ करियर के लिए नहीं, अपने दिमाग को तेज़ रखने के लिए भी एक नई भाषा सीखो।
अध्याय 4: प्रोटीन का संकट (The Protein Crisis)
“हम दुनिया के डायबिटीज़ कैपिटल हैं, क्योंकि हमारी थाली में ज़हर है।”
4.1 दाल-चावल का झूठ
बचपन से हमें सिखाया गया: “दाल में बहुत प्रोटीन होता है।” राघव, यह झूठ है। 100 ग्राम दाल में सिर्फ 20 ग्राम प्रोटीन होता है। बाकी 60 ग्राम कार्बोहाइड्रेट (Carbs) होते हैं। अगर तुम्हें दिन भर का प्रोटीन चाहिए, तो तुम्हें बाल्टी भर दाल पीनी पड़ेगी।
हमारी थाली देखो: 80% चावल या रोटी (Carbs), 10% आलू (Carbs), और थोड़ी सी दाल। यह खाना किसान के लिए ठीक था जो 10 घंटे खेत में हल चलाता था। लेकिन तुम कुर्सी पर बैठकर काम करते हो। तुम्हारे लिए यह खाना “ज़हर” (Slow Poison) है।
यही कारण है कि 30 की उम्र में भारतीयों का पेट बाहर निकल आता है और 40 की उम्र में शुगर (Diabetes) हो जाती है। हम ‘खा’ रहे हैं, पर हमें ‘पोषण’ नहीं मिल रहा।
4.2 चीनी कम (Sugar is Poison)
हमारे देश में खुशी का मतलब है: “मुंह मीठा करो।” परीक्षा पास की? मिठाई। शादी तय हुई? मिठाई। हमने चीनी को ‘प्रेम’ बना दिया है।
लेकिन चीनी कोकीन (Cocaine) की तरह नशा है। यह लीवर को सड़ा देती है। अगर तुम अपने परिवार से प्यार करते हो, तो उन्हें मिठाई मत खिलाओ। उन्हें फल खिलाओ, मेवे खिलाओ। मिठाई बांटना प्यार नहीं, बीमारी बांटना है।
अध्याय 5: खाने की आज़ादी (Food Freedom)
“धर्म दिल में होना चाहिए, पेट में नहीं।”
5.1 मेरी थाली, मेरी मर्ज़ी
मैं क्या खाता हूँ, यह मेरा निजी मामला है। क्या तुम किसी को इसलिए घर नहीं दोगे क्योंकि वो नॉन-वेज खाता है? यह “नया छुआछूत” है। दुनिया के 90% लोग, और भारत के 70% लोग मांस खाते हैं। शाकाहारी होना कोई ‘महानता’ नहीं है, यह सिर्फ एक चुनाव (Choice) है।
हिटलर भी शाकाहारी था। गांधीजी भी शाकाहारी थे। इंसान का चरित्र उसके खाने से तय नहीं होता।
5.2 पोषण (Nutrition) सर्वोपरि
अगर तुम्हारा बच्चा कमज़ोर है, उसे प्रोटीन चाहिए। अंडा (Egg) प्रकृति का सबसे सस्ता और बेहतरीन मल्टीविटामिन है। सिर्फ धर्म या परंपरा के नाम पर उसे इससे वंचित मत रखो। धर्म इंसान के लिए बना है, इंसान धर्म के लिए नहीं। सेहत पहले आती है, नियम बाद में।
अगर तुम मांसाहारी नहीं बन सकते, तो व्हे प्रोटीन (Whey Protein) लो। यह स्टेरॉयड नहीं है, यह दूध का पानी है। लेकिन अपनी बॉडी को भूखा मत मारो। एक कमज़ोर देश कभी विश्वगुरु नहीं बन सकता।
अध्याय 6: मकान का पिंजरा (Architecture)
“हमने अपने घर ऐसे बनाए हैं जैसे हम किसी और देश में रह रहे हों।”
6.1 कांच के जंगल (Glass Jungles)
राघव, अपने शहर की नई इमारतों को देखो। पूरी तरह कांच से ढकी हुई। नीली, चमकदार। तुम्हें लगता है यह “विकास” (Development) है? नहीं। यह “मूर्खता” है।
कांच की इमारतें यूरोप और अमेरिका के लिए बनी थीं, जहाँ ठंड पड़ती है। कांच सूरज की गर्मी को अंदर खींचता है और घर को गर्म रखता है (Greenhouse Effect)। भारत में, जहाँ तापमान 45 डिग्री जाता है, वहां कांच का घर बनाना अपने आप को ‘ओवन’ (Oven) में रखने जैसा है।
हम पहले घर को गर्म बनाते हैं, और फिर उसे ठंडा करने के लिए महंगे AC लगाते हैं और बिजली जलाते हैं। यह अमीरी नहीं है, यह “थर्मोडायनामिक अनपढ़ता” है।
6.2 आंगन की वापसी (Return of the Courtyard)
हमारे पूर्वज हमसे ज्यादा समझदार थे। उन्होंने “आंगन” बनाए थे। उन्होंने “जाली” लगाई थी। मोटी दीवारें, ऊँची छतें, और हवा आने का रास्ता। वो घर बिना AC के भी ठंडे रहते थे।
हमने ‘मॉडर्न’ दिखने के चक्कर में उन डिजाइनों को छोड़ दिया और कंक्रीट के डिब्बे (Box) बना लिए। अगर तुम अपना घर बना रहे हो, तो दुबई की नक़ल मत करो। राजस्थान और केरल के पुराने घरों से सीखो। हवा और रौशनी फ्री है। उसे अंदर आने दो।
6.3 कम में ज़्यादा (Minimalism)
हमारे घरों में एक बीमारी है: “कबाड़ जमा करना।” “इस पुरानी कुर्सी को मत फेंको, कभी काम आएगी।” “ये शादी के डिब्बे रख लो।”
हम चीज़ों से इतना प्यार करते हैं कि हम खुद के लिए जगह नहीं छोड़ते। एक अमीर आदमी का घर ‘भरा हुआ’ नहीं होता, वो ‘खाली’ होता है। “Space is Luxury.” अपने घर को म्यूज़ियम मत बनाओ। जो चीज़ काम की नहीं है, उसे निकाल फेंको। दिमाग भी साफ़ होगा।
अध्याय 7: लिबास की आज़ादी (Fashion)
“अगर तुम्हारे कपड़े तुम्हें पसीना दे रहे हैं, तो तुम स्मार्ट नहीं, गुलाम हो।”
7.1 गर्मी की गुलामी (Slavery of Heat)
जून का महीना। दोपहर के 2 बजे। दिल्ली की सड़क। एक आदमी ‘सूट, टाई और काला कोट’ पहनकर जा रहा है। उसे देखकर तुम्हें क्या लगता है? “कितना बड़ा अफसर है”? मुझे लगता है: “कितना बड़ा गुलाम है।”
सूट-टाई यूरोप के मौसम के लिए बने थे। वहां ठंड होती है, इसलिए वो गले को बंद रखते हैं (Tie)। हमारे यहाँ गर्मी होती है। हमें हवा चाहिए। लेकिन 75 साल बाद भी, हमारे कॉर्पोरेट दफ्तरों और वकीलों का ड्रेस कोड वही है जो अंग्रेज़ छोड़ गए थे।
हम अपने शरीर को उबाल रहे हैं, सिर्फ ‘प्रोफेशनल’ दिखने के लिए।
7.2 टिकाऊ फैशन (Sustainable Fashion)
हमें “कुर्ता” वापस लाना होगा। कुर्ता दुनिया का सबसे वैज्ञानिक कपड़ा है। इसमें हवा नीचे से आती है और शरीर को ठंडा रखती है (Convection)। खादी और कॉटन हमारी त्वचा के दोस्त हैं। पॉलिएस्टर और नायलॉन दुश्मन हैं।
10 सस्ती शर्ट खरीदने से बेहतर है कि 2 अच्छी खादी की शर्ट खरीदो। इससे तुम अच्छे दिखोगे, तुम्हें गर्मी नहीं लगेगी, और तुम्हारे पैसे से किसी गरीब जुलाहे (Weaver) का घर चलेगा, किसी विदेशी ब्रांड का नहीं।
अध्याय 8: जश्न का सलीका (Civic Sense)
“तुम्हारी खुशी अगर पड़ोसी का दुःख बन जाए, तो वो त्यौहार नहीं, तमाशा है।”
8.1 दीप vs धमाका (Lights vs Noise)
दिवाली का मतलब है: दीप-वली (दीपकों की पंक्ति)। यह रोशनी का त्यौहार है, आवाज़ का नहीं। पटाखे हमारे धर्म का हिस्सा नहीं थे, यह चीन की ईजाद है और मुगलों के समय भारत में आए।
फिर हम इसे “हिंदू धर्म” की रक्षा से क्यों जोड़ते हैं? जब तुम रात भर बम फोड़ते हो, तो तुम शहर के बुज़ुर्गों, मरीजों और जानवरों का दम घोट रहे होते हो। अपनी खुशी के लिए दूसरों को ज़हर (Smoke) देना ‘अधर्म’ है।
8.2 सड़क पर कब्ज़ा
हमारे यहाँ कोई भी जागरण, शादी या जुलूस सड़क रोककर शुरू हो जाता है। “भगवान का काम है, कोई कुछ नहीं बोलेगा।”
राघव, भगवान को ट्रैफिक जाम पसंद नहीं है। सड़क ‘नागरिक’ की है। उस पर टेंट लगाना दादागिरी है, भक्ति नहीं। धर्म को दिल में रखो, सड़क पर नहीं।
अध्याय 9: नए रीति-रिवाज़ (New Rituals)
“परंपरा वो है जो हम बनाते हैं।”
9.1 संविधान दिवस (Republic Day)
26 जनवरी को सिर्फ टीवी पर परेड मत देखो। अपने बच्चों के साथ बैठो और संविधान की प्रस्तावना (Preamble) पढ़ो। “हम भारत के लोग…” यही वो मंत्र है जो हमें आज़ाद रखता है। इसे एक धार्मिक रस्म की तरह मनाओ।
9.2 रविवार की ट्रेक (Nature Rituals)
रविवार को मॉल (Mall) जाना बंद करो। मॉल तुम्हें सिर्फ ‘खर्च’ करना सिखाता है। परिवार को लेकर किसी पहाड़, नदी या जंगल में जाओ। बच्चों को मिट्टी छूने दो। प्रकृति ही असली मंदिर है। वहां जाने से जो शांति मिलती है, वो किसी फूड-कोर्ट में नहीं मिलेगी।
अध्याय 10: शहर की सैर (The Urban Flâneur)
“शहर को कार की खिड़की से मत देखो, उसे अपने जूतों से नापो।”
10.1 पैदल चलना (Walking)
हम ‘पैदल’ चलने को गरीबी की निशानी मानते हैं। “अरे, वो पैदल आया है? उसके पास कार नहीं है क्या?”
लेकिन दुनिया के सबसे अमीर शहरों (लंदन, न्यूयॉर्क, पेरिस) में लोग पैदल चलते हैं। जब तुम पैदल चलते हो, तब तुम शहर को ‘महसूस’ करते हो। तुम्हें वो दुकानें, वो लोग, वो समस्याएं दिखती हैं जो कार की रफ़्तार में छुप जाती हैं।
शहर पर अपना हक़ जमाओ। फुटपाथ की मांग करो।
10.2 तीसरी जगह (Third Place)
घर (First Place) और दफ्तर (Second Place) के अलावा, तुम्हें एक “तीसरी जगह” चाहिए। जहाँ तुम बिना पैसा खर्च किए बैठ सको। कोई पार्क, कोई लाइब्रेरी, कोई पुरानी सीढ़ी। जहाँ तुम “कंज्यूमर” नहीं, सिर्फ “इंसान” हो। ऐसी जगह ढूंढो। वो तुम्हारी रूह को सुकून देगी।
अध्याय 11: यात्रा (Travel)
“किताबें तुम्हें ज्ञान देती हैं, यात्रा तुम्हें समझ देती है।”
11.1 अपनी आँखों से देखो
व्हाट्सएप पर दुनिया देखना बंद करो। जाओ, देखो। केरल जाओ और देखो कि वहां लोग कैसे रहते हैं। नार्थ-ईस्ट (North East) जाओ और देखो कि वो चीनी नहीं, हमसे ज्यादा भारतीय हैं। गाँव में जाओ और देखो कि किसान कैसे जीता है।
यात्रा (Travel) पूर्वाग्रह (Prejudice) का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब तुम अजनबी से मिलते हो, उसका खाना खाते हो, तो नफरत मिट जाती है।
11.2 दुनिया का आईना
अगर हो सके, तो देश से बाहर जाओ। दुबई नहीं, यूरोप या जापान जाओ। देखो कि वहां लोग कैसे लाइन में खड़े होते हैं। कैसे वो सफाई रखते हैं। जब तुम वापस आओगे, तो तुम बदल चुके होंगे। तुम भारत को सिर्फ ‘प्यार’ नहीं करोगे, तुम उसे ‘सुधारना’ चाहोगे।
खंड 3 (जीवन) समाप्त।
हमने अपनी ज़ुबान, अपना खाना और अपना रहन-सहन सुधार लिया है। अब हम अपनी निजी दुनिया से बाहर निकलेंगे। अब हम बात करेंगे उस देश की, उस सिस्टम की, जिसका हम हिस्सा हैं।
अगला खंड: खंड 4: गणतंत्र (The Republic) नागरिक और कानून।